सामाचार

22, 23 दिसम्बर को वैदिक कार्यशाला का आयोजन।

न्यास के द्वारा वैदिक ज्ञान के लिए फेसबुक पर एक पृष्ठ बनाया गया है। जिसमें वैदिक ज्ञान की चर्चा की जाती है।

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योगामृत

“योगश्चित्वृयत्तिनिरोधः” प्रकृत सूत्र से महर्षि पतंजलि संकेत करते है कि चित्त की  वृत्तियों को यदि समाप्त करना है तो व्यक्ति को योग करना चाहिए। योगासन से व्यक्ति का शरीर सुन्दर एवं आकर्षक बनता है तथा उसका मन शीध्र एकाग्र होकर अध्ययन में लग जाता है। इसलिए विद्यार्थी के लिए योग अत्यन्त लाभकारी है। योग से व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का भी विकास होता है।

योगासन ही व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का हेतु  है। प्राणायाम ही व्यक्ति के दीर्घायुष्य को बढाता है।

व्यक्ति को सर्वप्रथम शारीरिक विकास करना चहिए। कविकुलगुरु कालिदास ने भी इसी विचार को प्रकट करने के लिए कहा है कि “शरीरमाद्यं खलुधर्मसाधनम्” अर्थात्  धर्म की सिद्धि में सर्वप्रथम, सर्वप्रमुख साधन शरीर ही है। इसीलिए शारीरिक शक्ति के संवर्धन हेतु योग एवं व्यायाम ब्रह्मचर्य की सिद्धि में भी महान् लाभकारी है । प्रातः कालीन वेला में व्यायाम का यह प्रशिक्षण अत्यन्त लाभप्रद एवं दर्शनीय होता है।